Thursday, July 5, 2018

कुकुर युग का आगाज


कर्नाटक चुनावों के दौरान एक अच्छी सीख दी गई थी कि देशाभक्ति सीखनी है तो कुत्तों से सीखो। कुत्ते इन्हीं के लिए मशहूर भी रहे हैं। पर कर्नाटक चुनावों में विमर्श बदल दिया गया। बताते हैं कि यह उनकी विशेषता है। बदलना तो बहुत कुछ था, पर वे अक्सर विमर्श बदलते हुए ही पाए गए। वफादारी पर वोट नहीं मांगे जा सकते। भला कोई उम्मीदवार यह कहके वोट कैसे मांगे कि मैं कांग्रेस या भाजपा का वफादार सिपाही हूं। जनता कह सकती है कि भैया, हम कब कह रहे हैं कि अपनी वफादारी बदलो। जीत जाओगे तो अपने आप बदल लोगे। पर कोई कहे कि मैं देशभक्त हूं तो जनता वोट देने के लिए टूट पड़ेगी जैसे कह रही हो कि भैया, बड़े भाग हमारे जो आप जैसा देशभक्त मिला। इसीलिए सीख यह नहीं दी गई कि वफादारी सीखनी है तो कुत्तों से सीखो। सीख यह दी गई कि देशभक्ति सीखनी है तो कुत्तों से सीखो। पिछले कुछ वर्षो में कुत्ते राजनीति में बहुत महत्वपूर्ण हो उठे हैं। खास तौर से जब से गुजरात के दंगों के सिलसिले में कहा गया कि कार के नीचे आकर कोई कुत्ते का पिल्ला मर जाए तो कार बैठे व्यक्ति का क्या दोष। समस्या यह रही कि तब तक विमर्श नहीं बदला था1 कुत्ते को कुत्ते की मौत मरने लायक ही माना जा रहा था। बहरहाल, इधर श्रीराम सेना के नेता प्रमोद मुत्तालिक ने इस कुकुर विमर्श को और आगे बढ़ाया है। गौरी लंकेश की हत्या के बारे में बोलते हुए उन्होंने कहा कि जरूरी थोड़े ही है कि कोई कुत्ता भी मर जाए तो प्रधानमंत्री उस पर अपनी प्रतिक्रिया दें। गौरी लंकेश की हत्या पर एक ट्रोल वीर ने कुछ इसी तरह की बात कही थी कि एक कुतिया मर गई तो देखो पिल्ले कैसे बिलबिला रहे हैं। तब पता चला था कि उसे बड़े-बड़े दिग्गज फॉलो करते हैं। जो भी हो यह कुकुर विमर्श पुष्पित-पल्लवित होकर बड़े विमर्श का रूप ले चुका है। जाहिर है इसे भी समृद्ध बनाने में शासकों का ही ज्यादा योगदान रहा है। शासकों में सब शामिल हैं छुटभैये भी और केंद्रीय मंत्री भी। दिक्कत यह है कि कर्नाटक में दी गई सीख का अनुसरण कोई नहीं कर रहा कि देशभक्ति सीखनी है तो कुत्तों से सीखें। वैसे इस पुरानी सीख का अनुसरण कर भी कौन रहा है कि वफादारी सीखनी है तो कुत्तों से सीखें।

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